Sunday, January 29, 2012

राष्ट्रवाद बन चुकी है बनियों की दूकान में मिलने वाली रेवड़ी जो की मीडिया या अख़बारों में परोसे जाने से ही स्वादिष्ट बनती है. स्थापित बनियों में सफ़ेद टोपी वाले या हाफ पैंट वाले हैं.. लेकिन ये देसी दुकानदार हैं जो विदेशी मुलम्मा न चढ़े उसका बहुत ध्यान रखते हैं. ये आध्यात्मिकता के दिखावे भी बहुत बढ़िया करते हैं. इनसे भी ज्यादा शातिर लाल झंडे वाले हैं हो तथाकथित मानवता के स्वनामधन्य ठेकदार बना दिए गए हैं. इनको विदेशी टिप (बैरे को दिए जाने वाले दान ) लेकर विश्व-बंधुत्व की बातें करने में आत्म-बोध होता है. ये बात करते हैं विश्व बंधुत्व की लेकिन शायद यह भूलने के बाद या भूल जाने का दिखावा करते हुए कि “अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम, उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम”. यह भारतीय राजनीति का दर्शन है. इनके उत्पाद हैं नव-निर्मित उदारवादी जो की उदारवाद के विरोध में कुछ भी सुनना पसंद नहीं करते. राष्ट्रीय अस्तुत्व और महत्व के लिए किसी विदेशी व्यवस्था से तुलना करने का सहारा लिए बिना इनकी विकासवाद की परिभाषा नामुमकिन जान पड़ती है. विदेशी प्रमाण-पत्र प्राप्त ये महानुभाव अब सुशासन या सुयोग्य भारतीय नेतृत्व के लिए भी विदेही प्रमाणपत्रों को अनिवार्य बताने लगे हैं. इन सभी के साथ है बनिए की गुलाम कलम या कलमकार जो कि अपनी सीमाएं तय कर चुकी है और शायद क्षमताएं भी. इनसे अलग एक और समूह है वे उस नए तबके कि परिकल्पना के स्वरुप मात्र कहे जा सकते हैं जो आत्म-मुग्ध है. किसी भी कीमत पर उनमे प्रशंसा (लोकेष्णा ) की इतनी प्रबल चाह है कि वे आम जनता को हमेशा निम्न-दृष्टि से देखते हुए देशे या सुने जा सकते हैं. ये है वर्तमान भारत का बुद्धिजीवी समूह विन्यास.
अब हम बात करते हैं देश दुनिया की.. देश की परिभाषा भारतीय शिक्षा व्यवस्था की प्रारंभिक, वुर्व-माध्यमिक और माध्यमिक यहाँ तक उच्चतर और स्नातक कक्षाओं के पाठ्यक्रमों से नदारद है. शायद यह वजह हो सकती है की व्यक्ति का सामाजिक या राष्ट्रीय विवेचन उस व्यक्ति की एक स्व-परिधेय अभिदृष्टि से ज्यादा बड़ा नहीं बन पाता. नतीजा व्यक्ति की जीवन प्राथमिकताएं पूर्व-स्थापित मानकों के सन्दर्भ में स्व-परिधेय अभिदृष्टि से प्रेरित होती हैं. उनके केंद्र में उसका उद्देश्य नहीं उसकी मुलभुत आवश्यकताएं होती हैं. यह शासन प्रणाली की नाकामी है. शिक्षा व्यवस्था हमारे नागरिकों को कामातुर पशु या मनुष्य जैसा तो बना रही है लेकिन इस काम में प्रेम नहीं है. “निद्रा, भोजनम, मैथुनम” के सिवा जीवन की प्राथमिकतायें क्या है यह तय करने में व्यक्ति एक चौथाई जीवन व्यतीत करता है. अगला एक चौथाई उसकी प्राप्ति लिए संघर्ष करते हुए. यद्यपि मानव जीवन की प्राथमिकताएं मनुष्य की मुलभुत आकांक्षाएं (वित्तेष्णा, पुत्रेष्णा या कमेष्णा और लोकेशन ) ही तय करती हैं लेकिन ये प्राथमिकतायें भी मृग मरीचिका मात्र नज़र आती हैं. जीवन मूल्य और सिद्धांत उद्देश्य विहीन नागरिक जीवन में ”निद्रा, भोजनम, मैथुनम” से अधिक कुछ नहीं नज़र आता. ऐसे में बंधुत्व, दया, क्षमा, प्रेम, दान और सम्दार्शिता की आशा निरर्थक जान पड़ती है. यह है भारत का मतदाता वर्ग.
इन्ही के बीच में गुजरते हुए अक्सर सोचा करता हूँ की मै कौन सा भारतीय हूँ? क्या राष्ट्रवादी भारतीय होने के लिए इन स्थापित बनियों की दुकान से प्रमाण पत्र लेना और अखबारी ढिंढोरा पीटना अनिवार्य है.?

Tuesday, January 10, 2012

रात जब अपने पूरे कगार पर थी ,
तब कलम मेरे हाथ में थी
और साथ उन सभी पुराने दोस्तों का ,
जिनके साथ, मेरा साथ है कुछ सालों का ,
यह दोस्त पुराने तो है , सही मगर.................
यह देते है एक एहसास .......
जो रात की शुरुआत से सुबह तक ।
फ़िर उजाले की भीड़ मे खो जाते है ,
यह दोस्त है ...सन्नाटे ,खामोशी
यह सिलसला है पुराना
मगर फ़िर भी है .......दोस्ताना हमारा ।

Thursday, May 12, 2011

!!!!!!!!सोनिया गांधी के पास पावर है,
लेकिन
ज़िम्मेदारी नहीं है
और मनमोहन सिंह की पास ज़िम्मेदारी है तो पावर नहीं है,

अब और अधिक नहीं चल सकती. यह व्यवस्था यूपीए-1 के दौरान तो कामयाब रही,

क्योंकि आज के मुक़ाबले तब के गठबंधन के सहयोगियों के कुछ सिद्धांत थे.
जैसा कि अब नहीं है.
पिछले कुछ महीनों में राजनीति का जन सरोकारों से मानो
नाता खत्म सा हो गया है.----आशीष शुभ
ऊंचाई तीन फुट, लेकिन हौसले हैं बुलंद
महिला एवं बाल विकास विभाग में पर्यवेक्षक पद पर सफलतापूर्वक कार्य कर रही है पूनम
मुख्यमंत्री ने दिया आशीर्वाद

महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा संचालित योजनाओं का लाभ हितग्राहियों तक सही तरीके से पहुंचे इसके लिए पद से जुड़े सभी दायित्वों का निर्वहन मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ करते रहूंगी। ये बात आज यहां पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के प्रेक्षागृह में महिला सशक्तिकरण और सामाजिक बदलाव विषय पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला के दौरान घरघोड़ा परियोजना में पर्यवेक्षक के पद पर पदस्थ कुमारी पूनम मित्तल ने कही। वैसे तो पूनम की ऊंचाई तीन फुट ही है लेकिन उनके हौसले बुलंद है। जीवन की प्रकृति प्रदत्त विषमताओं को जिस जीवटता से उन्होंने चुनौती देकर उन पर विजय पायी, उससे वे न केवल महिलाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनी है बल्कि प्रदेश में महिला सशक्तिकरण को भी सही मायने में चरितार्थ कर रही हैं। सेमीनार में प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने मंच पर पूनम को आशीर्वाद दिया और उनके लगन तथा साहस की तारीफ की। मुख्यमंत्री ने उन्हें जीवन में इसी तरह सदैव आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। मुलाकात के दौरान घरघोड़ा निवासी पूनम ने कहा कि उनका कोई भाई नहीं है वे अपने पिता का सहारा बने रहेंगी और यह साबित करेंगी कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं है।

    कुमारी पूनम का कहना है कि धैर्य, लगन और मेहनत से अपने उद्देश्य को सफलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि पर्यवेक्षक पद पर उनकी नियुक्ति होने पर उनके माता-पिता गर्व का अनुभव करते हैं और उन्हें अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों के लिए भी प्रोत्साहित करते हैं। कुमारी पूनम अपने माता-पिता की तीन कन्या संतानों में दूसरे नम्बर की पुत्री हैं। पूनम ने बताया कि कम ऊंचाई के कारण चढ़ने उतरने में थोड़ी परेशानी जरूर होती है लेकिन इसकी वजह से कार्यालयीन कार्यो के निर्वहन में कोई रूकावट नहीं आती है। वे नियुक्ति के बाद से आंगनबाड़ी केन्द्रों का निरीक्षण करने के साथ ही आंगनबाड़ी कार्यकताओं को आ रही समस्याओं का समाधान भी कर रही हैं। उनकी सोच है कि वे जब जिस पद पर पदस्थ रहेंगी, उससे जुड़े दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी और जिम्मेदारी से करेंगी। पूनम ने बताया कि वे वर्तमान में शासकीय नौकरी के साथ-साथ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित होने वाली परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही हैं। पूनम ने कहा कि जब तक वे महिला एवं बाल विकास विभाग में पर्यवेक्षक के पद पर रहेंगी, तब तक विभाग द्वारा विभागीय योजनाओं और गतिविधियों के लिए निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने का प्रयास करेंगी।---आशीष शुभ
गंजापन ढकने को टोपी, मेरे सिर पर रहती है।
ठिठुरन से रक्षा करती हूँ , बार-बार यह कहती है।।



देखो अपनी गाँधी टोपी,
सारे जग से न्यारी है।
आन-बान भारत की है ये,
हमको लगती प्यारी है।।





लालबहादुर और जवाहर जी ने,
इसको धार लिया।
भारत का सिंहासन इनको,
टोपी ने उपहार दिया।।





टोपी पहिन सुभाषचन्द्र,
लाखों में पहचाना जाता।
टोपी वाले नेता का कद,
ऊँचा है माना जाता।।





समाज ,राजनीत और दर्शन पर क्या लिखा जाये ,रोज़ टीवी चेन्नेल्स पर देश दुनिया ,समाज और विशेषकर आम आदमी की दुर्दशा
पर इतना कुछ दिखाया जा रहा है ..लेकिन तस्वीर नहीं बदल रही ..दुष्यंत ने कहा
था की ..मेरी कोशिश है की ये सूरत बदलनी चाहिए ,इस हिमालय से कोई गंगा
निकालनी चाहिए ..कुछ नहीं बदलता ,कोई बदलने को तैयार नहीं .प्रेमचंद के ज़माने
से लेकर आज तक आम आदमी की स्थिति जस की तस है .घीसू -माधव सरीखे
गरीब पात्रों की करूँ -गाथा का निरंतर विस्तार हो रहा है . वर्तमान में .नेता ,अफसर
,ठेकेदार और महाजन की भूमिका में बहुरास्ट्रीय कंपनिया /बैंक निर्धन नागरिको का
शोषण -उत्पीरण करने पर उतारू है . .ताज्जुब होता है की आज़ादी की लड़ाई में
इन विदेशी कंपनियों के खिलाफ ही जंग लड़ी गयी थी ,आज हम उनका ही तहेदिल
से स्वागत कर रहे है .
.आज़ादी के लिए भगतसिंह ,राजगुरु ,सुखदेव जैसे नोजवानो ने फांसी के फंदे
को चूम लिया था ..क्या आज के भारत के लिए .? क्या उनके सपनो के भारत का
निर्माण हो सका है ..?.कदापि नहीं शहीदों के भारत का स्वप्न खंडित हुआ है ..अब ना
बाकी कोई आदम इस ज़माने में जो उठाये सलीब फिर अपने कंधे पर .क्या यही कहना
चाहिए ? लेकिन दुष्यंत ने एक आस जगाई थी …वे मुतमईन हैं की पत्थर पिघल नहीं
सकता ,में बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए .----आशीष शुभ