Thursday, May 12, 2011

जय श्री राम


सोचिये उन तमाम माताओं के बारे में जिनके लाल मातृभूमि का मान रखने के लिए हँसते हँसते शहीद हो गए.
जिनके परिजन अब भी सीमा पर जेलों में यातनाएं झेल रहे हैं,उनकी रोती आँखों का आंसू सिर्फ सहानुभूति के मरहम से कभी न पोंछा जा सकेगा.
प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्तमान में ७४ लापता सैन्य अधिकारी पाकिस्तान
की जेलों में कैद हैं जिसमे से ५४ अधिकारी १९७१ से ही उन जेलों में अपने
दिन काट रहे हैं.वहाँ की जेलों में उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जाती
है,कारगिल युद्ध के बाद जब लेफ्टिनेंट सौरव कालिया एवं पांच और सैनिकों का
शव हिंदुस्तान को सौंपा गया तब अत्यंत ही विकृत स्थिति में था,उनके शरीर
पर यातनाओं के वीभत्स निशान पाए गए थे,यह सीधे सीधे जेनेवा कन्वेंसन में
युद्धबंदियों हेतु निर्धारित नियमों का उल्लंघन था, शहीद सौरव कालिया के
पिताजी ने भारत सरकार इत्यादि सभी सक्षम संस्थाओं को पत्र लिखकर दोषियों
को सजा देने की मांग की,लेकिन क्या कभी दोषी दण्डित हो पाए?

मैं इस पोस्ट के माध्यम से नम्र निवेदन करना चाहूँगा तमाम मानवाधिकार
समर्थकों से जो एमनेस्टी,रेड क्रॉस इत्यादि मानवाधिकार संगठनो से जुड़े हुए
हैं कि सीमा पर यातनाएं झेल रहे युद्ध बंदियों के मानवाधिकार की रक्षा एवं
उनकी अतिशीघ्र रिहाई के लिए यथोचित प्रयास करें… मेरी यह उत्कट अभिलाषा है
कि हम सभी अपने वीर सैनिकों के योगदान को सम्मान दें और उनकी सकुशल देश
वापसी के लिए यथाशक्ति प्रयास करने से कभी पीछे न हटें.

हम यह कभी न भूलें कि हम इतने बेफिक्र इसीलिए हैं कि हमारे जवान सीमा पर
चाक चौबंद हो खुद जान की बाजी लगा कर हमें खुली हवा में सांस लेने की
आजादी देते हैं,जो हमारे लिए अपने जान की परवाह भी नहीं करते,क्या हमारा
उनके लिए इतना भी फ़र्ज़ नहीं बनता?

मैं इस मंच के माध्यम से सरकार से यह आग्रह करता हूँ कि युद्ध बंदियों की
समस्या का गंभीरता से अवलोकन करे,और अतिशीघ्र उनकी रिहाई के लिए पर्याप्त
पहल करे.-------आशीष शुभ

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